एक गृहिणी शहर में रहकर बचा रही देसी पेड़ों के बीज

पुणे की एक गृहिणी वैष्णवी पाटिल कहती हैं, "हर बीज का हक है पौधा बनने का और पौधे से पेड़ बनने का, उनका हक हमें देना चाहिए।" आइए जानते हैं शहर में रहकर भी वह कैसे प्रकृति की हिफाजत और देखभाल कर रही हैं।

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हर बीज का हक है पौधा बनने का और पौधे से पेड़ बनने का उनका हक हमें देना चाहिए। पर्यावरण के प्रति अपनी इसी सोच के साथ पुणे की इस गृहिणी ने अपने घर को बनाया बीज बैंक और लोगों को मुफ्त में बांट रही हैं देसी पेड़ों के बीज। उन्होंने अभी तक 50 लाख से ऊपर बीजों का डोनेशन किया है। उन्होंने आम इंसानों से लेकर वन विभाग तक बीज पहुंचाए हैं। आज उनके पास से देश भर की बहुत सारी संस्थाओं और निसर्ग प्रेमियों को यह बीज जा रहे हैं। दरअसल इस काम की शुरुआत उनके प्रकृति प्रेम की वजह से ही हुआ है। गांव में पली-बढ़ी वैष्णवी पाटिल ने स्कूल में अपने जीवन का पहला पौधा लगाया था और तब से प्रकृति से उनका खास लगाव हो गया। एक किसान परिवार की बेटी जब पुणे जैसे शहर में रहने आई तो उन्हें यहाँ देसी पेड़-पौधों की कमी खलती थी। ऐसे में उन्होंने पर्यावरण से जुड़ें NGO के साथ मिलकर पौधे उगाना शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने बहुत सारी NGO से जुड़कर काम चालू किया था। जान उन संस्थाओं को देसी वृक्षों के बीज चाहिए थे तो वैष्णवी ने उन्हें देसी दुर्लभ वृक्षों के सीड मुहैया करवाएं।

उन्होंने वेस्टर्न घाट के पेड़ों और मार्केट में वेस्ट जाने वाले फलों के बीज लाकर इन संस्थाओं को देना चालू किया। समय के साथ बीज जमा करना और अलग-अलग संस्थाओं तक पहुँचाना वैष्णवी का काम ही बन गया जिसे आज वह अपनी खुद की संस्था ‘आरम्भ फाउंडेशन’ के तहत आगे बढ़ा रही हैं। पिछले तीन सालों में उनकी संस्था से कई प्रकृति प्रेमी जुड़ चुके हैं। लोगों को फ्री में सीड बांटने के अलावा उन्होंने अब तक 4000 पौधें भी बांटे हैं और7000 बड़े छायादार पौधे लगाकर उनका संरक्षण भी कर रही हैं।

अगर आप भी उनसे बीज लेना या उनतक दुर्लभ बीज पहुंचाना चाहते हैं तो आरम्भ फाउंडेशन को सोशल मीडिया पर संपर्क कर सकते हैं।

1 Comment

  1. Vinay Kumar says:

    सलाम है ऐसी जागरूकता को! आधुनिक जीवनशैली और शहरीकरण के दौर में जब लोग प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, उस समय एक गृहिणी का देसी पेड़ों के बीजों को बचाने का प्रयास न सिर्फ सराहनीय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा भी है। ऐसे प्रयास ही हमारे पर्यावरण और जैव विविधता को जीवित रख सकते हैं।

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