वंदना शिवा 1960 के दशक की 'हरित क्रांति' (Green Revolution) की कड़ी आलोचक रहीं। उनका मानना था कि:
1991 में, वंदना शिवा ने 'नवदान्य' (Navdanya) आंदोलन की शुरुआत की, जिसका अर्थ है "नौ बीज" या "नया उपहार"। उद्देश्य: बड़ी कंपनियों द्वारा थोपी जा रही 'मोनोकल्चर' (एक ही तरह की फसल) खेती के खिलाफ लड़ना और देसी बीजों का संरक्षण करना। उपलब्धि: नवदान्य के तहत उन्होंने पूरे भारत में 40 से अधिक बीज बैंक (Seed Banks) स्थापित किए। उन्होंने किसानों को समझाया कि जलवायु परिवर्तन के दौर में स्थानीय बीज ही फसल को बचा सकते हैं, न कि कंपनियों के महंगे जीएम (GM) बीज।

वंदना शिवा ने 'बायोपायरेसी' (Biopiracy) यानी प्रकृति और ज्ञान की चोरी के खिलाफ वैश्विक स्तर पर आवाज उठाई। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) और ट्रिप्स (TRIPS) समझौते का कड़ा विरोध किया, जो जीवन के रूपों (Life forms) और बीजों के पेटेंट की अनुमति देता था। उनका तर्क था कि कंपनियां किसानों को हर साल बीज खरीदने पर मजबूर कर रही हैं और उनके पारंपरिक अधिकारों को छीन रही हैं। 1999 में सिएटल में हुए WTO विरोध प्रदर्शन में उनकी आवाज प्रमुखता से गूंजी।
वंदना शिवा ने अपनी कलम को भी हथियार बनाया। उनकी प्रमुख किताबें हैं: Biopiracy: The Plunder of Nature and Knowledge (1997) Stolen Harvest (1999)
Water Wars (2002) - जिसमें उन्होंने पानी के निजीकरण का विरोध किया। 2001 में, उन्होंने देहरादून के पास 'बीज विद्यापीठ' की स्थापना की, जो टिकाऊ जीवन और जैविक खेती सिखाने वाला एक अनूठा स्कूल और ऑर्गेनिक फार्म है।
डॉ. वंदना शिवा का जीवन हमें सिखाता है कि "धरती का लोकतंत्र" (Earth Democracy) ही असली लोकतंत्र है। उन्होंने साबित किया कि विज्ञान का उपयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति और मानवता के संरक्षण के लिए होना चाहिए।
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