​क्या आपका स्मार्टफोन सुरक्षित है? जानिए डिजिटल वॉयलेंस के वो 5 चेहरे जो महिलाओं के लिए खतरा बन रहे हैं !

​क्या आप जानते हैं कि आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन, जो दुनिया से जुड़ने का सबसे बड़ा साधन है, कभी-कभी एक हथियार भी बन सकता है? हम अक्सर सड़कों पर महिलाओं की सुरक्षा की बात करते हैं, अंधेरे रास्तों से डरते हैं, लेकिन क्या हम उस ‘अदृश्य’ खतरे को पहचान पा रहे हैं जो हमारे बेडरूम तक, हमारी स्क्रीन के ज़रिए पहुँच चुका है? संयुक्त राष्ट्र वीमेन (UN Women) का एक डरावना आंकड़ा कहता है कि दुनिया भर में करीब 58% महिलाओं को ऑनलाइन हिंसा या डिजिटल वॉयलेंस का सामना करना पड़ता है। यह हिंसा सिर्फ ‘वर्चुअल’ नहीं है; इसके घाव असली हैं, जो किसी के मानसिक स्वास्थ्य, करियर और यहाँ तक कि जान पर भी भारी पड़ सकते हैं।

 

​डिजिटल दुनिया में हिंसा का स्वरूप लगातार बदल रहा है। आइए जानते हैं उन 5 प्रमुख तरीकों के बारे में, जिनके ज़रिए आज महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया जा रहा है:

 

​1. डॉक्सिंग (Doxing): निजी जानकारी का हथियार

​डॉक्सिंग डिजिटल हिंसा का एक बेहद खतरनाक रूप है। इसमें किसी व्यक्ति की निजी जानकारी—जैसे घर का पता, फोन नंबर, ईमेल या निजी दस्तावेज़—बिना उनकी सहमति के ऑनलाइन सार्वजनिक कर दिए जाते हैं।

 

​असर: इसका मकसद पीड़ित को डराना या नुकसान पहुँचाना होता है। जब यह जानकारी पब्लिक होती है, तो ऑनलाइन उत्पीड़न वास्तविक जीवन (Real Life) में पीछा करने (Stalking) और शारीरिक हिंसा में बदल सकता है।

 

​2. डीपफेक्स (Deepfakes): AI का काला सच

​आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का वरदान अब अभिशाप बनता जा रहा है। डीपफेक्स तकनीक का इस्तेमाल करके किसी महिला के चेहरे को किसी अश्लील वीडियो या आपत्तिजनक तस्वीर पर इतनी सफाई से लगा दिया जाता है कि वह बिल्कुल असली लगता है।

 

​असर: इसका इस्तेमाल सबसे ज़्यादा मशहूर हस्तियों और अब आम महिलाओं के चरित्र हनन (Image tarnishing) के लिए किया जा रहा है। यह पीड़ित की सामाजिक प्रतिष्ठा को पूरी तरह नष्ट कर सकता है।

 

​3. ट्रोलिंग (Trolling): शब्दों के बाण

​सोशल मीडिया पर किसी को परेशान करने, नीचा दिखाने या उकसाने के लिए जानबूझकर भड़काऊ, अपमानजनक या नफरत भरे कमेंट्स करना ट्रोलिंग कहलाता है। यह सिर्फ मज़ाक नहीं होता, बल्कि एक सुनियोजित हमला होता है।

​असर: लगातार ट्रोलिंग का शिकार होने से महिलाओं में एंग्ज़ाइटी (Anxiety), डिप्रेशन बढ़ जाता है और उनका आत्मसम्मान (Self-esteem) बुरी तरह टूट सकता है।

 

​4. साइबर बुलिंग (Cyberbullying)

 

​यह डिजिटल दुनिया की रैगिंग जैसा है। सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स या ऑनलाइन गेमिंग के दौरान किसी को डराना, धमकाना या भद्दे संदेश भेजना साइबर बुलिंग के दायरे में आता है।

​असर: दुखद बात यह है कि ऐसा करने वाला व्यक्ति अक्सर पीड़ित का कोई जानकार या परिचित भी हो सकता है। यह पीड़ित को मानसिक रूप से अलग-थलग और असुरक्षित महसूस कराता है।

 

​5. ग्रूमिंग (Grooming): विश्वास का धोखा

​यह विशेष रूप से कम उम्र की लड़कियों और बच्चों के लिए बड़ा खतरा है। इसमें अपराधी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए बच्चों से दोस्ती करते हैं, उनका भरोसा जीतते हैं और उनसे एक भावनात्मक रिश्ता बनाते हैं।

 

​असर: जब भरोसा कायम हो जाता है, तो अपराधी उनका यौन शोषण (Sexual Exploitation) या ब्लैकमेलिंग शुरू कर देते हैं। इसका असर ताउम्र रह सकता है, जिसमें खुद को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति और गंभीर मानसिक विकार शामिल हैं।

 

​निष्कर्ष

 

​इंटरनेट का आविष्कार हमें जोड़ने के लिए हुआ था, तोड़ने के लिए नहीं। 58% का यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। डिजिटल वॉयलेंस के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार ‘जागरूकता’ है। अगर आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ ऐसा हो रहा है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें—रिपोर्ट करें, ब्लॉक करें और साइबर सेल की मदद लें। याद रखें, स्क्रीन के पीछे छिपकर हिंसा करने वाला भी अपराधी ही है।

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