परिचय:
सालूमरदा थिमक्का कर्नाटक की एक ऐसी असाधारण महिला हैं, जिन्होंने अपनी गरीबी और शिक्षा की कमी को अपने रास्ते का रोड़ा नहीं बनने दिया, बल्कि निस्वार्थ समर्पण से पर्यावरण के क्षेत्र में एक ऐसा उत्कृष्ट योगदान दिया जो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है। उनकी कहानी दर्शाती है कि एक व्यक्ति भी प्रकृति के प्रति प्रेम और अथक परिश्रम से कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।
साहस और समर्पण की शुरुआत:
कर्नाटक के एक छोटे से गाँव में एक गरीब परिवार में जन्मी थिमक्का को कम उम्र में ही खेती-बाड़ी में परिवार की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद, उनका प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम था। एक दिन, एक बंजर सड़क पर चलते हुए, थिमक्का और उनके पति ने महसूस किया कि वहाँ कोई छायादार पेड़ नहीं है। इस दृश्य ने उन्हें इस निर्जन मार्ग के किनारे पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने शुरुआत में बरगद और इमली के पेड़ लगाए, और धीरे-धीरे गाँव के अन्य लोग भी इस नेक कार्य में शामिल होते गए। अगले कई दशकों तक, थिमक्का और उनके पति ने सड़क के लगभग चार किलोमीटर लंबे हिस्से पर 8,000 से अधिक पेड़ लगाए और उनकी देखभाल की।
पर्यावरण पर गहरा प्रभाव:
थिमक्का के इस अथक प्रयास ने न केवल बंजर सड़क के हिस्से को एक हरे-भरे गलियारे में बदल दिया, बल्कि स्थानीय पर्यावरण में भी अमूल-चूल सुधार किया। इन पेड़ों ने मिट्टी के कटाव को रोकने, वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने और वन्यजीवों के लिए एक आवास उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका काम जल्द ही कर्नाटक की "वृक्ष महिला" के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सम्मान:
थिमक्का का निस्वार्थ काम अनदेखा नहीं रहा। उन्हें पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया है:
पद्म श्री (2019): भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक से उन्हें सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार (2016): पर्यावरण के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार का यह सर्वोच्च सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ।
नादोजा पुरस्कार (2017): हम्पी विश्वविद्यालय द्वारा यह पुरस्कार पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने में उनके योगदान के लिए दिया गया।
कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार: कर्नाटक सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण योगदान देने वाले व्यक्तियों को दिए जाने वाले इस पुरस्कार से भी उन्हें नवाजा गया।
एक चिरस्थायी विरासत:
अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद, सालूमरदा थिमक्का आज भी पेड़ लगाना और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना जारी रखे हुए हैं। उन्हें निस्वार्थ समर्पण और अथक परिश्रम की सच्ची प्रतिमूर्ति माना जाता है।
उनकी कहानी दुनिया भर के सभी उम्र के लोगों को यह प्रेरणा देती है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी व्यक्ति अपने ग्रह को अधिक हरा-भरा, स्वच्छ और रहने के लिए बेहतर स्थान बनाने की दिशा में एक छोटा सा कदम उठाकर बड़ा बदलाव ला सकता है। थिमक्का की यह विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति से प्रेम करने और उसकी रक्षा करने के लिए हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
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