जहां एक ओर पुलिस के दबंग अधिकारियों का खौफ अपराधियों में दिखता है, वहीं वन विभाग में भी अब ऐसे अधिकारी सामने आ रहे हैं, जिनके नाम से जंगल माफिया थर्राते हैं. शहडोल जिले के दक्षिण वन मंडल में पदस्थ डीएफओ श्रद्धा पेंन्द्रें इन्हीं बेखौफ और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों में से एक हैं. अपने साहसी और दबंग कार्यशैली के कारण उन्हें अब 'जंगल की सिंघम' कहा जाने लगा है. आइए जानते हैं बिना किसी डर या दबाव के, अपनी ड्यूटी को पूरी शिद्दत से निभाने वाली इस 'लेडी सिंघम' की कहानी, जो लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है.
डीएफओ श्रद्धा पेंन्द्रें की आंखों में वो चमक दिखती है जो एक सच्चे योद्धा की पहचान है. भले ही मुस्कुराकर उन्होंने 'लेडी सिंघम' के संबोधन को टाल दिया हो, लेकिन हकीकत यह है कि क्षेत्र के रेत, जंगल माफिया और वन्य प्राणी तस्कर इनके नाम से कांपते हैं. उनका खौफ इस कदर है क्योंकि ये अधिकारी दिन हो या रात, कभी भी गश्ती पर निकल जाती हैं. इनके लिए फोर्स की मौजूदगी मायने नहीं रखती, जंगल की सीमा में अवैध गतिविधि दिखी नहीं कि तुरंत एक्शन शुरू.
श्रद्धा पेंन्द्रें कहती हैं, ''मैं अपनी सेवा पूरे शिद्दत के साथ करती हूं, और उसके लिए अपनी जान हथेली पर लेकर चलती हूं.'' उनका यह समर्पण ही उन्हें बाकी सबसे अलग और प्रभावी बनाता है.
वह अपनी एक कार्रवाई का ज़िक्र करते हुए बताती हैं कि कैसे एक बार सूचना मिली कि घना जंगल में रात के अंधेरे में अवैध उत्खनन कर रेत निकाली जा रही है. टीम को पहुंचने में देरी हुई, लेकिन मुखबिर का भरोसा न टूटे, इसलिए वह खुद अपने ड्राइवर के साथ मौके पर पहुँच गईं. बिना फोर्स के, रात के वक्त, उन्होंने अवैध उत्खनन वाली गाड़ी को जब्त कर लिया. जब ड्राइवर और उसके तीन-चार साथियों ने विवाद करने की कोशिश की, तो भी वह पीछे नहीं हटीं और कार्रवाई पूरी की.
उनका मानना है कि ''हम जितना डरेंगे लोग उतना डराएंगे, इसलिए बेधड़क निडर होकर काम करते रहती हूं.'' यही निडरता उनके करियर की पहचान रही है.
डीएफओ श्रद्धा पेंन्द्रें का करियर शुरू से ही चुनौतियों से भरा रहा है. वह जहां भी गईं, वहां के माफियाओं के बीच हड़कंप मच गया. चंबल के राष्ट्रीय उद्यान में अधीक्षक के तौर पर भेजे जाने का अनुभव उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा. उस दौरान उन्होंने मात्र कुछ महीनों में ही रेत के व्यापक स्तर पर तस्करी को रोकते हुए छोटे-बड़े वाहनों से लेकर जेसीबी तक, लगभग 78 वाहन जब्त किए. बिना पर्याप्त फोर्स के, सिर्फ 10-12 लोगों की छोटी सी टीम के साथ उन्होंने यह असंभव सा लगने वाला कार्य कर दिखाया.
वह दृढ़ता से कहती हैं, ''मेरे काम करने का स्टाइल ही यही है... मुझे डर नहीं लगता, जब मौत लिखी होगी उस दिन आएगी ही, मैं अपनी जान हथेली पर लेकर चलती हूं।'' उनका यह हौसला, यह ज़ज़्बा ही उन्हें माफियाओं के खिलाफ एक अभेद्य दीवार बनाता है.
2017 बैच की आईएफएस अधिकारी श्रद्धा पेंन्द्रें ने 2009 में फॉरेस्ट पीएससी का एग्जाम क्रैक किया था. वन विभाग में सेवा देते हुए उन्हें 15 से 16 साल बीत चुके हैं. इतने सालों में उन्होंने अपनी राह से कभी कदम पीछे नहीं हटाए. उनका संकल्प स्पष्ट है - जंगल और वन्यप्राणियों को बचाना है.
डीएफओ श्रद्धा पेंन्द्रें की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची ताकत वर्दी या हथियार में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण और निर्भीकता में होती है. वह हर उस महिला और पुरुष के लिए एक प्रेरणा हैं जो सोचते हैं कि चुनौतियों के सामने झुक जाना ही एकमात्र रास्ता है. यह 'लेडी सिंघम' साबित करती हैं कि ईमानदारी, साहस और ज़बरदस्त इच्छाशक्ति के बल पर कोई भी व्यक्ति अपनी राह में आने वाली हर बाधा को पार कर सकता है.
क्या आप उनके द्वारा चंबल में की गई कार्रवाईयों के बारे में और अधिक जानना चाहेंगे?


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