मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की रशीदा बी और चंपा देवी शुक्ला की दोस्ती, मानवता और संघर्ष की एक बेमिसाल कहानी है। ये दोनों महिलाएँ, जिन्होंने खुद भोपाल गैस त्रासदी (1984) के गहरे ज़ख्म झेले, अब उसी त्रासदी के कारण विकलांगता की चपेट में आए बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन गई हैं।
दुःख ने बदली राहें
गैस त्रासदी के बाद पैदा हुए बच्चों में बड़ी संख्या में विकलांगता देखने को मिली। रशीदा बी और चंपा देवी के जीवन में भी व्यक्तिगत दुख आया— चंपा देवी की बेटी ने एक विकलांग बच्ची को जन्म दिया, और इसी तरह रशीदा बी की बहन के बच्चे भी विकलांग पैदा हुए। इस व्यक्तिगत दर्द ने उन्हें एक साझा उद्देश्य दिया: गैस पीड़ितों के विकलांग बच्चों की ज़िंदगी को बेहतर बनाना।
1985 में शुरू हुई इनकी दोस्ती ने 2006 में एक बड़ी मुहिम की शक्ल ले ली। शुरुआत में, ये दोनों महिलाएँ अपनी माली हालत ठीक न होने के बावजूद, गैस पीड़ितों के लिए राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई मुहिमों में काम कर रही थीं। जब सरकार ने इन ट्रेनिंग को बंद किया, तो इन दोनों महिलाओं ने एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। इस आंदोलन में रशीदा बी ने मुस्लिम समुदाय की 50 महिलाओं का और चंपा देवी ने हिंदू समुदाय की 50 महिलाओं का नेतृत्व किया, जो उनकी दोस्ती की धर्मनिरपेक्ष मिसाल थी।
उनके निस्वार्थ संघर्ष और मुहिम के चलते, अमेरिका के एक संस्थान ने उन्हें प्रतिष्ठित 'गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार' देने का ऐलान किया। सम्मान लेने से पहले ही दोनों बहनों ने तय किया कि वे पुरस्कार में मिलने वाली $1,25,000 डॉलर (तकरीबन 58 लाख रुपये) की रकम से एक संस्था बनाएँगी। साल 2006 में इसी रकम से 'चिंगारी ट्रस्ट' की शुरुआत हुई। रशीदा बी और चंपा देवी एक-दूसरे को सगी बहन की तरह मानती हैं।
बदलाव: बीते 18 सालों में, चिंगारी ट्रस्ट में 1360 विकलांग बच्चों का रजिस्ट्रेशन हुआ है। इनमें से 100 बच्चे पूरी तरह सेहतमंद हो चुके हैं और अब आम लोगों की तरह जीवन जी रहे हैं। उनकी मुहिम लगातार जारी है।
अफ़सोस: इन दोनों महिलाओं को इस बात का अफ़सोस है कि इतने बड़े मानवीय कार्य में भी मध्य प्रदेश की सरकार ने खुलकर मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। रशीदा बी और चंपा देवी शुक्ला की कहानी इस बात का प्रमाण है कि व्यक्तिगत दुःख को भी सामूहिक साहस और निस्वार्थ प्रेम में बदलकर कैसे समाज में रोशनी फैलाई जा सकती है।
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