मौशमी के बड़े बेटे वेदांश को रिगिड स्पाइन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (आरएसएमडी) नामक एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जिससे उनकी मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं. इस बीमारी के बावजूद, वेदांश ने सभी मुश्किलों का सामना किया है और अपनी माँ के साथ दुनिया भर की यात्रा की है.
मौशमी ने 35 साल की उम्र में अपनी फिटनेस यात्रा शुरू की. उन्होंने खुद को फिर से पाया, बाइक चलाना सीखा और ट्रेकिंग भी की. उन्होंने एवरेस्ट बेस कैंप, चादर ट्रेक, गोइचाला ट्रेक, फूलों की घाटी, केदारकांठा और कुछ और ट्रेक पूरे किए. मौशमी बताती हैं कि उनके लिए इस जुनून को शुरू करना आसान नहीं था, लेकिन इससे मिली आजादी का एहसास बेजोड़ था. 2013 में उन्होंने अपनी खुद की बाइक खरीदी और लेह-लद्दाख और स्पीति में अपनी बाइक राइड पूरी की.
वेदांश, जो कि लाइफ सपोर्ट मशीन के सहारे एक आइसक्रीम की दुकान चलाते हैं, अपनी माँ के सबसे बड़े चीयरलीडर हैं. मौशमी का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे को नहीं छोड़ा, बल्कि उसे यह दिखाया कि जीवन को कैसे जीना है. उनका यह भी कहना है कि अगर यह स्वार्थ है, तो वह इसे गर्व से पहनेंगी.
यह कहानी हमें सिखाती है कि चुनौतियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, माँ और बेटे का रिश्ता एक-दूसरे के लिए ताकत और प्रेरणा का स्रोत बन सकता है. यह कहानी उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो यह मानते हैं कि माँ बनने के बाद वे अपने सपनों को छोड़ देते हैं. मौशमी ने यह साबित कर दिया है कि जीवन को पूरी तरह से जीना संभव है, चाहे आप किसी भी परिस्थिति में हों.
मौशमी का कहना है कि अभी बहुत कुछ करना और खोजना बाकी है. और वह अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करने का इरादा रखती हैं. यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है, अगर हमारे पास दृढ़ संकल्प और अपने प्रियजनों का समर्थन है.
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