प्रकृति की प्रहरी और बीजों की संरक्षक: डॉ. वंदना शिवा की प्रेरणादायक कहानी

डॉ. वंदना शिवा एक ऐसा नाम है, जिन्होंने विज्ञान की दुनिया से निकलकर खेतों और जंगलों को बचाने की एक वैश्विक मुहिम छेड़ी। 5 नवंबर 1952 को देहरादून (उत्तराखंड) में जन्मीं वंदना शिवा एक प्रसिद्ध भारतीय भौतिक विज्ञानी (Physicist) और प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन देसी बीजों को बचाने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और पर्यावरण के दोहन के खिलाफ लड़ने में समर्पित कर दिया है। ​हिमालय की गोद से क्वांटम फिजिक्स तक: वंदना का पालन-पोषण हिमालय की तलहटी में हुआ। उनके पिता एक वन अधिकारी थे और माँ एक किसान, जिससे प्रकृति के प्रति प्रेम उन्हें विरासत में मिला। शिक्षा में भी वे अव्वल रहीं: ​1976 में उन्होंने ओंटारियो की गुएल्फ़ यूनिवर्सिटी से 'फिलॉसफी ऑफ साइंस' में मास्टर डिग्री हासिल की। ​1978 में उन्होंने 'क्वांटम थ्योरी' (Quantum Theory) पर अपनी थीसिस के लिए वेस्टर्न ओंटारियो यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। ​जीवन बदलने वाला क्षण: पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वंदना अपने घर लौटीं, तो एक दृश्य ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। उनके बचपन का पसंदीदा जंगल काट दिया गया था और वहां सेब का बगीचा लगाने के लिए नदी को सुखा दिया गया था। इस विनाश ने एक वैज्ञानिक को पर्यावरणविद् बना दिया। ​1982 में, उन्होंने अपनी माँ की गौशाला (Cowshed) से 'रिसर्च फाउंडेशन फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इकोलॉजी' (RFSTE) की शुरुआत की। ​हरित क्रांति की आलोचना और देसी ज्ञान की वापसी:

वंदना शिवा 1960 के दशक की 'हरित क्रांति' (Green Revolution) की कड़ी आलोचक रहीं। उनका मानना था कि:

  • ​रासायनिक खेती ने मिट्टी को जहरीला बना दिया है।
  • ​देसी बीजों की विविधता खत्म हो रही है।
  • ​महंगे कीटनाशकों और बीजों ने गरीब किसानों को कर्ज के जाल में फंसा दिया है।
  • ​इसके जवाब में, उन्होंने भारतीय कृषि की प्राचीन विरासत को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया।
  • ​'नवदान्य' आंदोलन: 9 बीजों का उपहार

1991 में, वंदना शिवा ने 'नवदान्य' (Navdanya) आंदोलन की शुरुआत की, जिसका अर्थ है "नौ बीज" या "नया उपहार"। ​उद्देश्य: बड़ी कंपनियों द्वारा थोपी जा रही 'मोनोकल्चर' (एक ही तरह की फसल) खेती के खिलाफ लड़ना और देसी बीजों का संरक्षण करना। ​उपलब्धि: नवदान्य के तहत उन्होंने पूरे भारत में 40 से अधिक बीज बैंक (Seed Banks) स्थापित किए। उन्होंने किसानों को समझाया कि जलवायु परिवर्तन के दौर में स्थानीय बीज ही फसल को बचा सकते हैं, न कि कंपनियों के महंगे जीएम (GM) बीज।

​बायोपायरेसी और कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ जंग:

वंदना शिवा ने 'बायोपायरेसी' (Biopiracy) यानी प्रकृति और ज्ञान की चोरी के खिलाफ वैश्विक स्तर पर आवाज उठाई। ​उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) और ट्रिप्स (TRIPS) समझौते का कड़ा विरोध किया, जो जीवन के रूपों (Life forms) और बीजों के पेटेंट की अनुमति देता था। ​उनका तर्क था कि कंपनियां किसानों को हर साल बीज खरीदने पर मजबूर कर रही हैं और उनके पारंपरिक अधिकारों को छीन रही हैं। 1999 में सिएटल में हुए WTO विरोध प्रदर्शन में उनकी आवाज प्रमुखता से गूंजी।

​लेखन और शिक्षा:

वंदना शिवा ने अपनी कलम को भी हथियार बनाया। उनकी प्रमुख किताबें हैं: ​Biopiracy: The Plunder of Nature and Knowledge (1997) ​Stolen Harvest (1999)

​Water Wars (2002) - जिसमें उन्होंने पानी के निजीकरण का विरोध किया। ​2001 में, उन्होंने देहरादून के पास 'बीज विद्यापीठ' की स्थापना की, जो टिकाऊ जीवन और जैविक खेती सिखाने वाला एक अनूठा स्कूल और ऑर्गेनिक फार्म है।

डॉ. वंदना शिवा का जीवन हमें सिखाता है कि "धरती का लोकतंत्र" (Earth Democracy) ही असली लोकतंत्र है। उन्होंने साबित किया कि विज्ञान का उपयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति और मानवता के संरक्षण के लिए होना चाहिए।

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