मेधा पाटकर सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं; वे स्वयं में प्रकृति की एक शक्ति हैं। विस्थापित समुदायों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने से लेकर जंगलों और नदियों को बचाने तक, उन्होंने अपना पूरा जीवन सतत विकास (Sustainable Development) और पर्यावरण न्याय के लिए समर्पित कर दिया है।
'नर्मदा बचाओ आंदोलन' जैसे ऐतिहासिक संघर्षों के माध्यम से मेधा जी ने दुनिया को दिखाया है कि विकास की कीमत प्रकृति के विनाश से नहीं चुकाई जानी चाहिए। उनका विजन स्पष्ट है: पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय को एक साथ लेकर चलना होगा। 'मेधा पाटकर वृक्ष' (Medha Patkar Tree) इसी दृष्टि का प्रतीक है—जहां लगाया गया हर पेड़ सशक्तिकरण, स्थिरता और एक हरे-भरे भविष्य का प्रतिनिधित्व करता है।
1 दिसंबर 1954 को मुंबई में जन्मीं मेधा पाटकर का पालन-पोषण एक ऐसे परिवार में हुआ जो सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित था। उनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे और माँ एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिससे बचपन से ही उनमें न्याय के प्रति गहरी समझ विकसित हुई।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) से सामाजिक कार्य में डिग्री हासिल करने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि बड़े पैमाने पर होने वाले विकास प्रोजेक्ट पर्यावरण विनाश और लोगों के विस्थापन का कारण बन रहे हैं। बदलाव लाने के दृढ़ संकल्प के साथ, उन्होंने 1985 में नर्मदा बचाओ आंदोलन (NBA) की स्थापना की। यह आंदोलन नर्मदा नदी पर बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ था, जिसने हजारों आदिवासी समुदायों और किसानों को विस्थापित कर दिया था।
नर्मदा नदी मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के लाखों लोगों की जीवन रेखा रही है। सरदार सरोवर जैसे विशाल बांधों के निर्माण से बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, आवासों का विनाश और मूल निवासियों का विस्थापन हुआ।
मेधा पाटकर ने तर्क दिया कि जंगल, नदियां और मानव बस्तियों को एक साथ सुरक्षित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि पेड़ नदियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनों के बिना, जल स्रोत सूख जाते हैं, मिट्टी का कटाव होता है और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) ढह जाता है।
पेड़ केवल ऑक्सीजन का स्रोत नहीं हैं; वे हमारे ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। वृक्षारोपण पर्यावरण को कैसे लाभ पहुंचाता है, इसके मुख्य बिंदु यहाँ दिए गए हैं: कार्बन सोखना (Carbon Sequestration): पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं। एक पूर्ण विकसित पेड़ प्रति वर्ष 48 पाउंड तक CO₂ सोख सकता है। मिट्टी का संरक्षण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं, जो वनों की कटाई के कारण एक बढ़ती हुई समस्या है। भूजल स्तर बढ़ाना: जंगल वर्षा के पानी को जमीन में रिसने में मदद करते हैं, जिससे भूमिगत जल भंडार फिर से भर जाते हैं।
वायु शुद्धिकरण: पेड़ प्रदूषकों को फिल्टर करते हैं और ताजी ऑक्सीजन छोड़ते हैं। जैव विविधता: जंगल हजारों प्रजातियों को आवास प्रदान करते हैं, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है।

मेधा पाटकर का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण में उन लोगों को शामिल करना चाहिए जो इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उन्होंने कई समुदाय-संचालित वनीकरण कार्यक्रमों का नेतृत्व किया है जहाँ स्थानीय लोग पेड़ लगाने और उनकी रक्षा करने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
वनीकरण से समुदायों में कैसे बदलाव आता है:
आजीविका के अवसर: फलदार वृक्ष और कृषि-वानिकी किसानों को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कमाई में भी मदद करते हैं। सामाजिक सशक्तिकरण: संरक्षण परियोजनाओं में महिलाएं, किसान और युवा नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं।
मेधा पाटकर के आजीवन समर्पण ने उन्हें वैश्विक प्रशंसा दिलाई है: राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड (1991): जिसे अक्सर "वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार" कहा जाता है। गोल्डमैन एनवायरनमेंटल प्राइज (1992): पर्यावरण संरक्षण में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए। पद्म श्री (2014): उन्होंने अपनी जमीनी सक्रियता के सिद्धांतों के प्रति सच्चे रहते हुए इस सम्मान को अस्वीकार कर दिया था।
मेधा पाटकर का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा करना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। 'मेधा पाटकर वृक्ष' लचीलेपन, न्याय और स्थिरता का प्रतीक है। आप भी इस मुहीम का हिस्सा बन सकते हैं—देसी पेड़ लगाएं, पानी बचाएं और अपने समुदाय को जागरूक करें। क्योंकि बदलाव की शुरुआत छोटे कदमों से ही होती है।
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