सुनीता नारायण भारत की सबसे प्रभावशाली पर्यावरणविदों और नीति विश्लेषकों में से एक हैं। वह एक ऐसी लेखिका और कार्यकर्ता हैं जो मानती हैं कि ज्ञान का उपयोग केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका इस्तेमाल समाज में बदलाव लाने के लिए किया जाना चाहिए. पिछले चार दशकों से, वह भारत में पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई में सबसे आगे रही हैं।
सुनीता नारायण 1982 से नई दिल्ली स्थित शोध और वकालत केंद्र, 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' (CSE) के साथ जुड़ी हुई हैं. वर्तमान में, वह इस प्रतिष्ठित संस्थान की कार्यकारी निदेशक (Executive Director) के रूप में नेतृत्व कर रही हैं.
इसके अलावा, वह मीडिया और संचार के माध्यम से भी पर्यावरण जागरूकता फैला रही हैं:जल संकट के समाधान में सुनीता नारायण का काम अनुकरणीय रहा है। उन्होंने वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को बढ़ावा देने और सामुदायिक जल प्रबंधन के नए मॉडल विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके राजनीतिक प्रभाव और जल संरक्षण के प्रयासों के लिए उन्हें प्रतिष्ठित 'वर्ल्ड वाटर प्राइज' (World Water Prize) से सम्मानित किया गया है.
2005 में, जब राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व से बाघों के पूरी तरह लुप्त होने की खबर आई, तो देश में हड़कंप मच गया था। इस संकट के बाद, प्रधानमंत्री के अनुरोध पर सुनीता नारायण ने 'टाइगर टास्क फोर्स' की अध्यक्षता की. उनके नेतृत्व में देश में बाघों के संरक्षण के लिए एक ठोस कार्य योजना (Action Plan) तैयार की गई.

सरकार ने उनकी विशेषज्ञता का उपयोग कई महत्वपूर्ण समितियों में किया है: * वह प्रधानमंत्री की जलवायु परिवर्तन परिषद (Prime Minister's Council on Climate Change) की सदस्य रही हैं. * उन्होंने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (National Ganga River Basin Authority) की सदस्य के रूप में भी सेवा दी है.
पर्यावरण के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान और निस्वार्थ सेवा को मान्यता देते हुए, भारत सरकार ने 2005 में उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया.
सुनीता नारायण का जीवन यह साबित करता है कि सही शोध और मज़बूत इरादों के साथ नीतियां बदली जा सकती हैं। चाहे वह पानी का मुद्दा हो, बाघों का संरक्षण हो या जलवायु परिवर्तन, सुनीता नारायण हमेशा प्रकृति की वकालत करने वाली एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरी हैं।
This will close in 0 seconds