यह कहानी है असम के काजीरंगा नेशनल पार्क के पास बोकाखात कस्बे की उमा छेत्री की, जिनके माता-पिता दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं और जो खुद आज वर्ल्ड कप विजेता भारतीय महिला क्रिकेट टीम का हिस्सा हैं.
रविवार को मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने इतिहास रच दिया, जब उन्होंने साउथ अफ्रीका को हराकर 52 साल में पहली बार विमेंस वर्ल्ड कप का ख़िताब जीता. इस ऐतिहासिक जीत में एक नाम उमा छेत्री का भी है, जिनकी संघर्ष-गाथा हर किसी को प्रेरित करती है.
उमा छेत्री का बचपन घोर आर्थिक तंगी में बीता. उनके माता-पिता खेतों में दिहाड़ी मज़दूरी करते थे, और उमा ने भी अपने परिवार की मदद के लिए खेतों में काम किया है. लेकिन मुश्किल हालातों ने उनके सपनों को मरने नहीं दिया.
आज, 23 वर्षीय यह धाकड़ विकेटकीपर-बल्लेबाज अपने त्याग और अटूट विश्वास के बल पर भारत की वर्ल्ड कप विजेता टीम का हिस्सा बनकर, उस संघर्ष को सफलता के शिखर तक ले गई हैं.

कठिनाई को अपनी पहचान न बनने देने वाली उमा ने, आठ साल की छोटी सी उम्र में ही अपनी असाधारण लगन का प्रमाण दे दिया था. वह रोज़ 16 किलोमीटर पैदल चलकर क्रिकेट ट्रेनिंग सेंटर जाती थीं.
उनकी यह कठोर मेहनत और लगन ही उन्हें राष्ट्रीय टीम तक लेकर आई. 26 अक्टूबर 2025 को उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ वर्ल्ड कप ग्रुप मैच में वनडे डेब्यू किया और उपकप्तान स्मृति मंधाना से अपनी डेब्यू कैप प्राप्त की. वह असम की दूसरी महिला खिलाड़ी बनीं, जिन्होंने भारत के लिए वनडे खेला.
वर्ल्ड कप जीत से पहले भी, उमा छेत्री ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था:
एक छोटे से कस्बे की लड़की से लेकर वर्ल्ड चैंपियन बनने तक का उमा छेत्री का यह सफर, उन सभी के लिए एक शक्तिशाली संदेश है जो मानते हैं कि सपने देखने के लिए दौलत नहीं, बल्कि दिल में आग और आँखों में आत्मविश्वास होना चाहिए. उन्होंने इतिहास रचकर देश का तिरंगा शान से लहराया है.
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हर सफलता को ज़रूरत से ज़्यादा ड्रामाई बना देना भी ठीक नहीं है। मेहनत और टैलेंट अपनी जगह हैं, पर हर बात को ‘संसेशनल’ बनाकर पेश करना अच्छी आदत नहीं।