उधार के बल्ले से वर्ल्ड रिकॉर्ड तक: ऋचा घोष की ‘हार्ड हिटर’ बनने की कहानी !

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की धुआंधार विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋचा घोष

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की धुआंधार विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋचा घोष आज अपनी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी के लिए जानी जाती हैं, जो पलक झपकते ही मैच का रुख बदलने का माद्दा रखती हैं। पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से निकलीं इस 22 वर्षीय सनसनी ने संघर्ष और समर्पण के बल पर क्रिकेट जगत में अपनी पहचान बनाई है।

8वें नंबर पर उतरकर रचा इतिहास

हाल ही में हुए महिला वनडे विश्व कप मुकाबले में, ऋचा घोष ने अविश्वसनीय प्रदर्शन करते हुए अपना नाम रिकॉर्ड बुक में दर्ज करा लिया है:

  • उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तूफानी 94 रनों की पारी खेली।
  • इस पारी के दम पर, वह वर्ल्ड कप में आठवें नंबर पर उतरकर सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर बनाने वाली बल्लेबाज बन गईं।

अपनी हार्ड-हिटिंग क्षमता के कारण 18 साल की उम्र में पहली बार वनडे विश्व कप टीम में जगह बनाने के बाद, ऋचा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उधार का बल्ला और लड़कों संग ट्रेनिंग

ऋचा घोष के टीम इंडिया तक के सफर में उनके पिता मानवेंद्र घोष, जो खुद एक क्लब क्रिकेटर और कोच थे, का अहम योगदान रहा।

  • सिलीगुड़ी में महिला क्रिकेट को लेकर ज्यादा क्रेज नहीं था, इसलिए ऋचा की शुरुआती ट्रेनिंग लड़कों के साथ हुई।
  • लड़कों के साथ खेलकर उन्होंने गेंद की गति, उछाल और विषम परिस्थितियों में नहीं घबराने की कला सीखी। यही कारण है कि उनकी बल्लेबाजी शैली लड़कों जैसी ही आक्रामक है।
  • उनके पिता ने उन्हें क्रिकेट के गुर सीखने के लिए उधार का बल्ला भी दिलाया था, जिससे उन्होंने अपनी प्रतिभा को निखारा।

पिता का बलिदान: बिजनेस छोड़ अंपायरिंग की

ऋचा के पिता मानवेंद्र घोष उन्हें शुरुआत में टेबल टेनिस खिलाड़ी बनाना चाहते थे, क्योंकि उनके शहर में लड़कियों के लिए कोई क्रिकेट अकादमी नहीं थी। लेकिन जब ऋचा ने क्रिकेट खेलने की इच्छा जताई, तो पिता ने उनके सपने को पूरा करने के लिए बड़ा बलिदान दिया।

  • जब ऋचा ने क्रिकेट में करियर बनाने का फैसला किया, तो पिता ने उन्हें कोलकाता में बेहतर ट्रेनिंग दिलाने का निर्णय लिया।
  • मानवेंद्र घोष अपनी बेटी की सुरक्षा और ट्रेनिंग सुनिश्चित करने के लिए अपना बिजनेस छोड़कर कुछ समय के लिए ऋचा के साथ कोलकाता में रहने लगे।
  • वहाँ उन्होंने खर्च चलाने के लिए पार्ट टाइम अंपायरिंग का काम भी शुरू कर दिया।
  • पिता तभी अपने पुराने कारोबार में लौटे, जब ऋचा का टीम इंडिया में चयन हो गया।

16 साल की उम्र में इंटरनेशनल डेब्यू

मात्र 16 साल की उम्र में, ऋचा घोष ने भारतीय टी20 टीम में डेब्यू किया, जब उन्हें ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ट्राई सीरीज में पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का मौका मिला।

  • उसी वर्ष (2020) उन्होंने आईसीसी टी20 विश्व कप में भी हिस्सा लिया, जहाँ भारत उपविजेता रहा।
  • ऋचा घोष आज भारतीय महिला टीम की एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं और अपनी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग से लगातार टीम को मजबूती प्रदान कर रही हैं।

उनका सफर साबित करता है कि अटूट लगन, परिवार के समर्थन और विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने का जज़्बा हर बाधा को पार कर सकता है।

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